मनुष्य अकेला नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य ने जो रचनाएँ की हैं वह "अकेला-मनुष्य" नहीं कर सकता है। नदी पर बने एक पुल को देखें तो स्पष्ट कह सकते हैं कि मनुष्य जो अकेला हो वह यह रचना नहीं कर पाएगा। अस्तित्व की समस्या से जूझने वाला [अस्तित्ववादी] मनुष्य अकेला हो सकता है, लेकिन रचना में लगा मनुष्य अकेला नहीं जान पड़ता। तब, अकेलापन कहीं रचनाहीनता की स्थिति तो नहीं ?
प्रत्येक मनुष्य का अस्तित्व तो अकेला है, लेकिन वह रचना करने के लिए साथ आता है। तो, उसका अकेलापन प्रामाणिक(authentic) है या उसकी रचनाशीलता? कैसे मनुष्य अपने एकाकी अस्तित्व से बाहर आकर अन्य (others) से जुड़ता है?... कहीं उसका अस्तित्व ही इसकी अनुमति तो नहीं देता? "मनुष्य-अस्तित्व" के दरवाज़े जगत की ओर खुलते हैं। शरीर उसके और जगत के बीच का माध्यम है। इस माध्यम से जगत मनुष्य के लिए खुलता है। लेकिन, इस माध्यम को यदि उपयोग में ही न लाया जाय तो मनुष्य ख़ुद में बन्द हो जाता है। तो क्या यही अकेलापन है?
लेकिन जब किसी अन्य से अवगत ही न होंगे तो अकेलेपन का एहसास भी कहाँ होगा! मनुष्य को अन्य की अवगति तो है, लेकिन वह जिससे अवगत है उससे जुड़ाव नहीं महसूस कर रहा; यह स्थिति सम्भवतः अकेलापन है। एेसी स्थिति इसलिए आती है क्योंकि जो माध्यम है वह ऐसा है कि अवगत तो वह सहज कराता है। अवगति में कोई कठिनाई नहीं आती, क्योंकि अस्तित्व की ऐकिकता अक्षुण्ण (intact) रहती है। जुड़ाव कठिन है, जुड़ाव ऐकिकता को छूता है, उसे क्षत करता है। जुड़ाव ऐकिकता को खंडित ही कर दे, यदि वह सीधे (direct) हो। इसलिए, जुड़ने से मनुष्य-अस्तित्व को भय है। साथ ही, न जुड़ने से अकेलापन सताता है। तो, व्यवस्था कुछ इस तरह की है कि दोनों स्थिति से निकल सकें। मनुष्य जुड़ता है लेकिन सीधे नहीं, बल्कि रचनाओं में। अस्तित्व में न जुड़ कर, मनुष्य वहाँ जुड़ता है जहाँ वह ऐसा बिना किसी कठिनाई के कर सकता है और अस्तित्व को जिसके लिए अनुमति देने में कोई बाधा नहीं है। मनुष्य जो रचता है उसके सहारे वह अन्य तक आसानी से पहुँच सकता है, और अन्य उस तक। क्योंकि रचना सभी के लिए समान रूप से खुली होती है। अपनी रचना को दूसरे से साझा करते हुए मनुष्य जुड़ता है और जुड़ कर साझी रचनाएँ भी करता है। भाषा, धर्म, ईश्वर, संविधान, क़ानून, दर्शन, कला, विज्ञान इत्यादि सभी को इस रूप में समझ सकते हैं। मनुष्य जहाँ भी, जिससे भी जुड़ा है, उसकी रचनाओं ने उसे जोड़ा है। अस्तु, मनुष्य की रचनाएँ यह निर्धारित करती हैं कि उसका जुड़ाव किससे होगा। तो क्या मनुष्य को जिससे जुड़ना हो उसके अनुरूप रचना नहीं करना चाहिए...!
"क्या मनुष्य को जिससे जुड़ना हो उसके अनुरूप रचना नहीं करनी चाहिए...!"
ReplyDeleteइस एक लाइन में इस पूरे वक्तव्य का सार छिपा है । एक अद्भुत विषय पर आपने मन्तव्य किया है और वास्तविकता यही है कि रचनाशीलता ही हमें एक-दूसरे से जुड़ने का माध्यम प्रदान करती है । कई बार ऐसा दृष्टिगोचर होता है कि नितान्त अकेला व्यक्ति अपनी रचनाशीलता के माध्यम से ख़ुद को अकेला रखकर भी अकेला नहीं रहने देता । एकान्त और अकेलेपन की थोड़ी व्याख्याक्या मनुष्य को जिससे जुड़ना हो उसके अनुरूप रचना नहीं करना चाहिए...!
यहाँ अपेक्षित है । आपका यह विचार मनुष्य के अकेलेपन (lonliness) के सन्दर्भ में है या एकान्त (aloneness) के ? जहाँ तक मेरी समझ मुझे बता रही है आप अकेलेपन की बात कर रहे हैं । तो क्या रचनाशीलता अकेलेपन का परिणाम है या एकान्तवास में हमारी रचनाशीलता अधिक उन्मुक्त होती है ?
यहाँ ऐसा नहीं कहा जा रहा है कि अकेले में रचनाशीलता की क्या स्थिति है। यहाँ केवल यह सामने रखने का प्रयास है कि रचनाशीलता अकेलेपन से निजात दिलाने में सहायक हो सकती है। और, मनुष्य प्रकृति से अकेला नहीं है क्योंकि वह हमेशा सृजन करता रहा है। जिनके द्वारा यह स्वीकार किया जाता है कि मानव स्वभाव से अकेला है, उनके विरोध में सृजनात्मक मानव स्वभाव को एक तथ्य के रूप में रख कर यह दिखाया गया है कि सृजनात्मकता मनुष्य को अकेला नहीं रहने देती। सृजन या रचना मनुष्य भले ही अकेले में कर रहा हो, तब भी वह सृजन अपने अकेले के लिए नहीं करता। सृजित को अर्थ तभी मिलता है जब उसको सराहना मिलती है या उसकी उपयोगिता होती है। और वह सराहना केवल रचना करने वाले से और उपयोगिता केवल उसके अपने जीवन में अपेक्षित नहीं होती। इन बातों के आधार पर इस मान्यता को कि मनुष्य स्वभाव से अकेला है छोड़कर सृजन में लगने का आह्वान करते हुए यह बताया गया है कि सृजन जीवन के अकेलेपन से निवृत्ति का उपाय है। यहाँ वैसे अकेलेपन की बात की जा रही है जो आत्मघाती होता है।
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