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Monday, September 29, 2014

कल्पना और वास्तविकता का सातत्य

काल्पनिक और वास्तविक का भेद जिसके लिए शून्य हो जाता है उसको मैं दार्शनिक के रूप में पहचानता हूँ । वैसे दार्शनिक तो वास्तविक के दर्शन की आकांक्षा रखता है, लेकिन जब बात दर्शन की ही हो तो काल्पनिक का दर्शन भी वास्तविक की ही भाँति होता है । पिकासो ने जब कहा कि जो भी हम कल्पना कर सकते हैं वह सब वास्तविक है, तो उसने दार्शनिक की बोली बोला था । एक कलाकार से दार्शनिक की बोली सुनना आश्चर्यजनक नहीं है । कला का जब परिपाक होता है तो कला कल्पना को वास्तविकता में उतार देती है, या यूँ कहें कि कल्पना को वास्तविक कर देने में ही कला का परिपाक है ।  
        अभिनेता के लिए जगत एक रंगमंच हो जाता है । दर्शक तब पूरी तरह से देखता है जब वो अभिनेता से स्वयं को जोड़ लेता है, न सिर्फ़ जोड़ लेता है बल्कि अभिनेता ही बन जाता है, अभिनेता की जगह जब स्वयं को रख लेता है । तो मैं कहूँगा कि दर्शन करने के लिए अभिनय करना--किरदार निभाना आवश्यक है । यदि कोई कहे, कोई कैसे रंगमंच के कई किरदार--पात्र एक साथ बन सकता है? तो मैं स्मरण दिलाना चाहूँगा कि हर कोई हर समय ऐसा कर ही रहा होता है,--भले ही वह इसके बारे में सचेत न हो । स्वप्न में तो हम स्पष्टत: स्वयं ही कई भूमिकाएँ अदा कर लेते हैं । 
       अभिनेता जब जिस पात्र की भूमिका निभा रहा हो तब यदि अभिनेता में वह पात्र ही शेष रह गया हो, यानि कि   अभिनेता अभिनेता न रह गया हो, पात्र ही बन गया हो तो यह अभिनय की पूर्णता है । वहीं दर्शक को पूर्ण दर्शन के लिए अभिनय करना और अभिनय करने के लिए पात्र--किरदार बन जाना होता है । किरदार के काल्पनिक, ऐतिहासिक या वास्तविक होने से कोई अन्तर नहीं आता । अभिनय यदि पूर्ण है तो वास्तविक हो जाता है । दार्शनिक वही पूरी तरह देखने वाला दर्शक है जो अभिनय किए बिना अभिनय करता है और इतना पूर्ण अभिनय करता है कि पात्र--किरदार ही बन जाता है और उसका किरदार वास्तविक हो जाता है, वह किरदार को ख़ुद में उतार लेता है, कल्पना को वास्तविक धरातल पर ला देता है । तब कल्पित-चरित्र भी वास्तविक चरित्र बन जाता है । इसीलिए दार्शनिक के लिए काल्पनिक और वास्तविक का भेद शून्य हो जाता है ।