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Friday, July 5, 2013

भूत और भविष्य से मानव जीवन की अर्थवत्ता

एक मित्र मेरे साथ राजनीति विज्ञान के अध्येता थे। थे तो वे राजनीति विज्ञान के अध्येता परन्तु दार्शनिक कहूँगा उन्हें। बड़े प्रसन्नचित्त व्यक्ति हैं। एक बार यूं ही बातों बातों में मैंने उनकी ख़ुशी का भेद जानना चाहा। तो उनका सुझाव मिला "आदमी को कल और कल में नहीं जीना चाहिए "। मतलब समझना आसान था कि बीते कल को बिसार के और आने वाले कल से बेसुध हो के जिओ ।
बात तो बड़ी मतलब की है.....ठीक ही कहते हो। सभी उलझनें तो इनके विचार की ही देन लगती हैं। कोई भी राजी हो जाए इस बात से। सभी संत, सभी ज्ञानी, सभी बुद्ध ...सभी यही तो समझाये जा रहे हैं: वर्तमान में जिओ।

लेकिन, मैं राजी हो जाता, इतनी सरलता से, यह  मेरे स्वभाव में नहीं  था। मैंने उनकी  उस मान्यता के प्रति कटिबद्धता को परख लेना जरुरी समझा। मैंने उनकी बात को ठीक उलट कर कहा "मनुष्य को कल और कल में ही जीना चाहिए"। लेकिन अब बात खुशहाली  की नहीं रह गयी थी। उनका सुझाव खुशहाल जीवन जीने के लिए था। मैंने बात को अन्यत्र ही उन्मुख कर दिया। बात अब 'अर्थपूर्ण' जीवन की हो चली थी । मेरा कहना था कि मनुष्यों को छोड़ बाकी जीवों का विचार  करें तो हम पाते हैं की सभी वर्तमान में ही तो जी रहे है। सब तत्क्षण में मस्त हैं। मगर क्या इनके जीवन का कोई मतलब है ? क्या हम भी इनकी तरह बेमतलब ही जीना शुरू कर दें? ये तो ऐसे जीते हैं क्योंकि इनमें अर्थ की तलाश ही नहीं है। तो क्या हमें भी अर्थ की तलाश नहीं करनी चाहिए?  कहने का मतलब साफ था कि जो वर्तमान में जीता है उसके जीने का कोई अर्थ नहीं है, व्यर्थ है उसका जीवन और जो भूत व भविष्य में जीता है उससे तो ख़ुशी का कोई वास्ता नहीं लगता, उसे तो निराश ही जीना पड़ता है क्योंकि ना वो भूत को दुहरा सकता है ना ही भविष्य तक उसकी पहुँच है।

अब सवाल ये था कि मानव के लिए क्या अभीष्ट है: ख़ुशी--जिसके लिए वर्तमान में जीना पड़ता है , या फिर अर्थवत्ता -- जो  भूत और भविष्य का  मुखापेक्षी है। ओशो जैसे तथाकथित बुद्धों ने तो कह दिया, साफ शब्दों में, " अर्थ को खोजो ही मत, अर्थ खोजने जाओगे तो निराशा ही हाथ लगेगी।" उन्होंने तो ये भी कह दिया "मन को गिरा दो, ड्रॉप योर माइंड"। कैसे  कह देते  हैं  ये  लोग  लोगों  से कि  तुम अपनी विशिष्ट अद्भुत क्षमता खो दो, इसमें कोई आश्चर्य नहीं ; निहित अर्थ हैं उनके। आश्चर्य तो तब होता है जब लोग इसे मान लेते हैं। मन  ही वह विशिष्टता है  जिससे  मनुष्यता और पशुता का विभेद है। मन ही वह क्षमता है जो मनुष्य को वर्तमान से आगे भविष्य तक और पीछे भूत तक ले जाती है । तो फिर क्यों अपनी इस क्षमता का बाध करें, हमें तो इसे संवर्धित और संरक्षित करने का सोचना चाहिए। कुछ  जन तो ऐसे हैं जो अगर भविष्य को स्वीकृत भी कर दें तो वे भूत को हेय ही मानते हैं। उनका विचार है कि चूंकि हम भूत में कोई फेर बदल नहीं कर सकते, भूत के मामले में विवशता है, इसलिए भूत से निजात पा लेना ही बेहतर है। लेकिन, मुझे नीत्शे की बात याद आती है "वृक्ष जमीन के बाहर वही ऊंचाई पा सकता है जितनी जमीन के अंदर उसकी गहराई हो"। ठीक इसी तरह हम उतने ही आगे की सोच सकते है जितना पीछे तक  हमारी सोच गयी हो, उतने भविष्य का भान हो सकता है हमें जितने भूत को हमने जाना हो। तो अगर भविष्य में छलांग मारनी है तो मन को भूत से अवगत होना अपेक्षित है।



मनुष्य में ही अर्थ देने की क्षमता है। और कोई प्राणी किसी चीज को अर्थ नहीं दे सकता, जीवन को भी नहीं। और वे ऐसा इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास भूत और भविष्य से सम्बद्ध होने का कोई साधन नहीं है, जैसा कि मानव के पास है 'मन'। वर्तमान में मस्त रहना उनकी भूत और भविष्य में उतर पाने की असामर्थ्य की वजह से है। उनके वर्तमान में रत होने का महिमामंडन न करें, ये तो उनकी कमी है, पिछड़ापन है।

और, एक बात तो है वर्तमान में जीने वाले खुश चाहे हों या ना हों, लेकिन दुखी नहीं होते। तो इस तरह वर्तमान को जीने में कोई हर्ज नहीं। आख़िरकार मनुष्य भी तो एक प्राणी है इसकी भी तो अपनी गरिमा है। तो क्यों ना हम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों को  ही जीकर मानवता को उत्कर्ष दें!