Wednesday, February 5, 2014

धर्म, विज्ञान और दर्शन के जुड़ाव तथा जोड़-तोड़


        धर्मों की शुरुआत बड़ी बचकानी दृष्टि रखते हैं; धर्म चीजों को टुकडों में पाते हैं, और उनको एक साथ जोड़ते हैं; इस जोड़ने के प्रयास में धर्म प्रशंसा पाते हैं | धर्मों की पहचान ही जोड़ने की विशेषता से होती है । सभी टुकड़ों को एक मूल से जोड़ देने पर सभी टुकड़े भी आपस में संबंधित हो जाते हैं और ऐसा करने में धर्म सराहे जाते हैं । लेकिन, धर्मों का हठ इस बात को अनदेखा कर देता है कि जुड़े तो टुकड़े ही हैं, प्रथम उपलब्धि तो टुकड़ों की ही हुई; इन टुकड़ों को जब वह महत्वहीन करने को उद्यत होते हैं तो उनकी दृष्टि अंधे की दृष्टि के समान हो जाती है, वह अंधविश्वासी हो जाते हैं।
        विज्ञान की शुरुआत एक व्यापक दृष्टि में होती है और वह अपनी दृष्टि को सूक्ष्म करने में लगा रहता है। उसको एक जुड़ाव की उपलब्धि पहले होती है, फिर वह टुकड़े करता है, और पुनः जोड़ने का प्रयास करता है। जिन टुकड़ो में विज्ञान जुड़ाव नहीं देख पाता उनको वो अलग-अलग कर देता है। विज्ञान उत्तरोत्तर इस जुड़ाव को देखने में अक्षम होता जाता है, जितनी सूक्ष्मता से देखता है उतने ही असम्बद्ध टुकड़े मिलते हैं। विज्ञान अन्ततः इस बात को अनदेखा करके कि उसको जो पहले उपलब्ध हुआ था वह जुड़ा हुआ था, यह मान लेता है कि टुकड़े मौलिक हैं, ये खुद में कोई सम्बन्ध नहीं रखते , इनको अपनी सुविधानुसार सम्बन्धित किया जा सकता है। वैज्ञानिक उस प्रथमतः उपलब्ध स्वरुप को दृष्टि में नहीं रखता, जिस रूप में टुकड़ों को जोड़ना था। वह जब पुनः यथावत जोड़ पाने में अक्षम होता है, तो अपने किसी अन्यथा जोड़ को अपनी भूल ना बताकर यह कहता है कि इस तरह भी जोड़ा जा सकता है, यह एक आविष्कार है। वस्तुतः, विज्ञान का तोड़कर जोड़ने का तरीका हर जगह ग्रंथि (गांठ) बना रहा है। ये ग्रंथियां वो जुड़ाव नहीं हैं जो प्रथमतः उपलब्ध हुई थीं। लेकिन किसको पड़ी है उन प्रथमतः उपलब्ध जुड़ाव की ! वो जुड़ाव जिसने आश्चर्य में डाला था; वो जुड़ाव जिस पर दृष्टि गहन करने चले थे; वो कभी विज्ञान की दृष्टि में आ ही न सका, उसने तो अपने दृष्टि को सूक्ष्म करते हुए व्यापकता को खो दिया, और फिर जब पाने की कोशिश की तो पा न सका, पाया तो क्या? एक सतही, कृत्रिम व्यापकता।
         धर्मों को जो प्रथमतः उपलब्ध हुआ वह उनको सूक्ष्म दिखा, सीमित, अधूरा , अपर्याप्त दिखा, असम्बद्ध दिखा ; ऐसी दृष्टि में विश्वास निराश करता; तो धर्मों की सारी चेष्टा स्थूल, असीमित, पूर्ण व पर्याप्त की उपलब्धि का है। धर्म असम्बद्धता की अस्वीकृति हैं, धर्म सम्बन्ध बनाने के हठी हैं। जबकि,  विज्ञान को जो प्रथमतः उपलब्ध हुआ वह उसको स्थूल दिखा, असीमित , पूरा , पर्याप्त दिखा, सम्बन्धित (जुड़ा हुआ) दिखा ; जिससे उत्सुकता हुई कि ...ऐसा कैसे है? तो विज्ञान की सारी चेष्टा यह स्पष्ट करने की है कि जो स्थूल, असीमित, पूर्ण, पर्याप्त रूप में उपलब्ध है, सम्बन्धित है, ...वह कैसे सम्भव है? धर्म जुड़ाव में विश्वास रखता है और विज्ञान जुड़ाव पर आश्चर्य करता है। यह आश्चर्य इसलिए क्योकि विज्ञान असम्बद्धता में प्रच्छन्न विश्वास रखता है तो जुड़ाव को देख कर, सम्बन्ध को देखकर उसका आश्चर्य करना स्वाभाविक ही है।
         धर्म और विज्ञान दोनों कुछ करने को उद्यत हैं , कर्ता-वृत्ति रखते हैं ; धर्म भक्ति करना चाहते हैं और विज्ञान जानना चाहता है, ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। धर्म निवृत्ति करने को आतुर हैं तो विज्ञान प्रवृत्ति। करना दोनों को है कुछ न कुछ । इनकी प्रथमतः उपलब्धियों और समस्त कृत्यों की जो साक्षी रहे वो दृष्टि है दर्शन । दर्शन केवल द्रष्टा-वृत्ति है। वह विज्ञान का जिज्ञासित आश्चर्य देखता है और उसके आश्चर्य के पीछे का निहित विश्वास भी। वह धर्म की आशा और हठ को देखता है और उसके सम्बंध में विश्वास को भी।  दर्शन के समक्ष ये सभी उपस्थित है, दर्शन इनका साक्षी है, द्रष्टा मात्र है। दर्शन को दृष्टिगत है कि जुड़ाव दिखे तो तोड़ा जा रहा है, टूटा दिखा तो जोड़ा जा रहा है, यह भी कि... ऐसा क्यों है? क्यों धर्मों को टुकड़े और विज्ञान को जुड़े हुए दिखते हैं तथा क्यों धर्म  टुकड़ों में जुड़ाव करते हैं और विज्ञान क्यों जोड़ों को तोड़ता है? ... दर्शन  इनके सभी निर्णयों को देखता मात्र है , अवगत मात्र रहता है इनसे; इन पर अपना कोई निर्णय तक नहीं लेता । फ़लसफ़ा (फिलोसोफी) में निर्णय लिए जाते हैं, लेकिन उसमें भी लिए गये निर्णयों में आत्यन्तिकता नहीं । फ़लसफ़ा समग्रता में लिया गया निर्णय है, लेकिन दर्शन निर्णय के समग्र हो सकने को ही इनकार करता है; अवगति ही मात्र समग्र हो सकती है। समग्र का साक्षात्-मात्र दर्शन है। निर्णय लेना वैज्ञानिक क्रिया है; जब निर्णय लिया जाता है तो सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, और सम्बन्ध स्थापित करने के लिए पहले असम्बन्धित रूप में स्वीकारना पड़ता है; असम्बन्धित होने का निहित विश्वास रखना वैज्ञानिक दृष्टि है। इसीलिए , विज्ञान और
फ़लसफ़ा समत्व रखते हैं ; दोनों मानते हैं कि जोड़ना है, पहले से जुड़ाव नहीं है । वहीं दूसरी ओर, दर्शन और धर्म दोनों पूर्व-जुड़ाव के हिमायती हैं । धर्म टुकड़े में आस्था रखने को बिल्कुल तैयार नहीं होंगे, धर्म केवल समग्र में आस्थावान हैं; धर्मों के लिए समस्त एक साथ है, समूचा सम्‍बद्ध है । और जब सम्‍बद्ध है ही तो सम्‍बन्‍धित करने की कोई ज़रूरत ही नहीं, ज़रूरत है तो केवल उस समग्र की अवगति की । इसलिए, धर्म और दर्शन समत्व रखते हैं, दोनों को समग्र का साक्षात्-मात्र अपेक्षित है । धर्म समग्र का साक्षात्कार कराते हैं और दर्शन के साक्षी-भाव में समग्र उपलब्ध होता है । दर्शन का धर्मों से समत्व है लेकिन दर्शन-धर्म-एकत्व है । जो बहुतायत तथाकथित धर्म हैं वे तो धर्म के आडम्बर हैं, धर्म नहीं । जिन्होंने धर्म को मौलिक अर्थ में नहीं लिया उन्होंने आडम्बर किये हैं धर्मों के ।
          जो धर्म जोड़ने की बात करे समझ लेना कि वो थोथा धर्म है । वास्तविक धर्म तो केवल वो है जिसमें कुछ जोड़ना नहीं है , सब पहले से ही जुड़ा हुआ है । धर्म की स्थापना नहीं की जाती, वह तो स्थापित है ही । तो जो भी धर्म स्थापित किया गया है उनमें से कोई भी वास्तविक अर्थ में धर्म है ही नहीं । धर्म की जब भी स्थापना की गयी उसने सदा तोड़ने का काम किया है । धर्म की स्थापना की जाती है जोड़ने को, पर जोड़ना किसको? ... जोड़ने के लिए तो कुछ था ही नहीं, सब जुड़ा ही हुआ था; लेकिन, धर्म भी स्थापित करना था, तो एक ही तरीका रहा कि तोड़ो, फिर जोड़ो । ये तोड़ने का काम ही अभी तक धर्मों ने किया है , जोड़ा नहीं है कुछ , जो जुड़ा था उसको तोड़ा है । धर्म कभी जोड़ता नहीं ; क्या जोड़े?.. कुछ है ही नहीं जोड़ने को । जोड़ने वाला कुछ भी धर्म नहीं है, जो जुड़ा है ही वो धर्म है । और जो जुड़ा ही है वह है स्वभाव, मौलिकता, प्रकृति -- अपनी निर्मलता में, अपने निर्विकार रूप में । तो हर स्वाभाविक जीवन जीने वाले को मैं धार्मिक कहूँगा ।
          धार्मिकता आस्तिकता है । वही आस्तिक है जो 'अस्ति' है, यानी कि जो 'है' है । यह 'है' ही धर्म है । अस्ति और आस्था बेमेल बातें है। ऐसा नहीं है कि 'अस्ति' में आस्था जगाना हो, पनपाना हो, पैदा करना हो । एक है कोई अस्ति, कोई भगवान; और दूसरा अनस्ति, मनुष्य , जिसमें अस्ति के प्रति आस्था जगाई जानी हो । और ये बताना कि अनस्ति में अस्ति की आस्था से अनस्ति अस्ति हो जाता है बिल्कुल असंभव सी बात बोलना है ; जो नहीं है वो कैसे हो सकता है! ... मैं यह नहीं कह रहा  कि 'अस्ति' नहीं है, ऐसा तो कहा ही नही जा सकता । मेरा कहना तो बस इतना है कि आस्था  कभी स्वस्थ नहीं हो सकती । धर्म स्वस्थ है, अस्थ नहीं । आस्था शब्‍द बना ही है  'अस्थ' से । आस्थावान होने का मतलब ही हुआ स्वस्थ न होना । स्वस्थ का आस्था से कोई सरोकार नहीं, वह तो अलमस्त है । कभी भी स्वस्थ आस्थावान नहीं होता; अस्वस्थ, रुग्ण, अस्थ ही आस्थावान होता है और जितने भी धर्म आस्था से अनुप्राणित हैं सब के सब धर्म अस्वस्थों के हैं ।